• Dr. M. S. Chauhan

    Dr. M. S. Chauhan
    Director

    • Current Research Area

    डा. मनमोहन सिंह चौहान ने असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जिनमें से कुछ महत्वपूर्ण निम्नानुसार हैं, उदाहनार्थ:i) भ्रूण स्टेम सेल तकनीक का विकास और पांच एम्ब्रायोनिक भैंस स्टेम सेल लाइनों और दो स्पर्मेटोनियल स्टेम सेल लाइनों का उत्पादन; ii) गाय एवं याक में ओवम पिक-अप IVF-तकनीक का इस्तेमाल करके भारत का पहला OPU-IVF साहिवाल बछड़ा ‘होली’ और OPU-IVF याक बछड़ा ‘नॉर्जील’ का उत्पादन किया; iii) डॉ मनमोहन सिंह चौहान ने भैंस में एक साधारण हस्त-निर्देशित क्लोनिंग तकनीक विकसित की और चौदह क्लोन भैंस का उत्पादन किया, जिनके नाम हैं- दुनिया का पहला क्लोन भैंस बछड़ा ‘गरिमा’,  ‘गरिमा-II’,  ‘श्रेष्ठ’,  ‘स्वर्ण’,  ‘पूर्णिमा’, ‘लालिमा’, ‘ रजत’,  दीपाशा आदि;  iv) सीमेन फ्रीजिंग तथा बकरी में कृत्रिम गर्भाधान और v) दवा और कृषि उपयोग की भैंसों में ट्रांसजेनिक पशु उत्पादन पद्धति की स्थापना की। ओपीयू-आईवीएफ और क्लोनिंग टेक्नोलॉजी दोनों तकनीक उपयोग में लाये जा रहे हैं।

    डॉ. चौहान विदेशों से प्राप्त 11 वित्तपोषित परियोजनाओं के प्रधान अन्वेषक (पी.आई.) तथा 9 अंतर-विषयक और अंतर-संस्थागत बाह्य वित्तपोषित परियोजनाओं के सह-अन्वेषक रहे हैं जिसके लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग, डीएसटी, एनएआईपी-आईसीएआर और आईसीएआर के एनएएसएफ से 23.88 करोड़ रुपये प्रदान किए गए। उन्होंने 10 डॉक्टरल और 9 मास्टर अनुसंधान प्रबंधों में मार्गदर्शन किया है। अनुसंधान के अलावा,  उन्होंने पढ़ाने तथा स्नातक स्तर के छात्रों के लिए पशु शरीरक्रिया विज्ञान और पशु जैव प्रौद्योगिकी के 4 पाठ्यक्रमों को विकसित करने में भी योगदान दिया है।

    डॉ. चौहान नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (नास फेलो) http://naasindia.org/detail.php?id=95 नेशनल एकेडमी ऑफ डेरी साइंसेज (एफएनडीएस) तथा प्रसार शिक्षा सोसाइटी रहे हैं।​

    डॉ. चौहान को वर्ष 2015 का आईसीएआर रफी अहमद किदवई पुरस्कार प्राप्त हैं। उन्हें नास द्वारा वर्ष 2020 का पी.भट्टाचार्या मैमोरियल पुरस्‍कार; आईएआरआई,  नई दिल्ली द्वारा राव बहादुर बी विश्वनाथ पुरस्कार, 2019;  कृषि विज्ञान में वीएएसवीआईके औद्योगिक पुरस्कार, 2015; पशु विज्ञान (2014) में आईसीएआर-टीम पुरस्कार, 2014; आईएसएसआरएफ द्वारा डॉ. लभसेत्‍वर पुरस्कार, 2016; डीबीटी बायोटेक्नोलॉजी ओवरसीज फैलोशिप अवार्ड, 1997; डेरी साइंस, वर्जीनिया टेक, यूएसए, 1999; में अनुकरणीय अनुसंधान पुरस्कार प्राप्‍त है।

    डा. चौहान ने वर्ष 2009 में जर्मनी की वैज्ञानिक के रूप में यात्रा की।  उन्‍हें वर्ष 2009 में यूरोपीय इरैस्मस मुंडस छात्रवृत्ति पुरस्कार प्रदान किया गया। डा. चौहान भारत सरकार के डीबीटी टास्क फोर्स के सदस्य भी रहे हैं तथा महानिदेशक, आईसीएआर से उन्‍हें 2 प्रशंसा पत्र प्राप्‍त हुए हैं। उन्होंने एन.डी.आर.आई., करनाल में 12 वें (नास) कांग्रेस सहित 4 सम्मेलन (2 राष्ट्रीय और 2 अंतर्राष्ट्रीय) आयोजित करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके अलावा उन्होंने 8 राष्ट्रीय प्रशिक्षण (21-दिवसीय) आयोजित किए हैं। डॉ मनमोहन सिंह चौहान के द्वारा 155 मूल शोध पत्र, 07 पुस्‍तकें, 44 राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रकाशन लेखक तथा सहलेखक के रूप में प्रकाशित किए गए हैं। आपने राष्‍ट्रीय तथा अंतराष्‍ट्रीय सम्‍मेलनों में 34 व्याख्यान सह-लेखक के रूप में दिए है।  (http://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/?term=chauhan+MS+Karnal) (साएटेशन: https://scholar.google.com/citations?hl=en&user=NSkU8fUAAAAJ)

    डॉ मनमोहन सिंह चौहान के विदशों के अनुभव : उन्होंने यूएसए (3 बार), कनाडा और जर्मनी में विभिन्न प्रयोगशालाओं का दौरा किया है।

    डॉ चौहान को दूरदर्शन द्वारा ‘’किसानों का महानायक’’ की उपाधि से सम्मानित किया गया है ।  आप डीडी-किसान: एपिसोड 18 और राज्यसभा टीवी के यूरेका कार्यक्रम https://www.youtube.com/watch?v=u4JLO-klw9k  व  https://www.youtube.com/watch?v=V30RJqhskZ0 में हमेशा देखे जा सकते हैं।

    केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, मखदूम के निदेशक तथा अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (बकरी) के परियोजना समन्वयक के अपने कार्यकाल में डॉ मनमोहन सिंह चौहान ने तीन वर्ष और छह महीने की अवधि के दौरान गोट सीमेन फ्रीजिंग प्रोटोकॉल तथा कृत्रिम गर्भाधान सहित 04 प्रौद्योगिकियों विकसित कर उनका वाणिज्यीकरण किया गया। इसके अलावा एनएबीएल प्रमाणित प्रयोगशाला सहित 06 प्रौद्योगिकियाँ विकसित की गयीं तथा कुछ प्रौद्योगिकियों के वाणिज्यीकरण किये जाने का प्रयास किया जा रहा है।  एमओपीआई के 3.5 करोड़ रूपये के सहयोग से मीट उत्पाद पर एक रेफरल प्रयोगशाला विकसित की गयी है। किसानों के लिए एकल विंडों व्‍यवस्‍था बनायी गयी है और यहाँ से 35000 से अधिक किसान आवश्यक सूचना और सहायता प्राप्त कर चुके हैं। अनुसंधान के क्षेत्र में डीएसटी, डीबीटी तथा एनएएसएफ-आईसीएआर से 13 बाहरी वित्तपोषित प्ररियोजनाएँ (8.66 करोड़ रूपये की) प्राप्त गयीं हैं तथा 6 वैज्ञानिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। 1) डॉ मनमोहन सिंह चौहान ने आईसीएआर-सीआईआरजी, मखदूम,  मथुरा (उ.प्र.) में अपने कार्यकाल के दौरान सीमेन फ्रीजिंग तथा पशु-चिकित्सा अधिकारियों के लिए कृत्रिम गर्भाधान में प्रशिक्षण, 2) बकरी की नस्लों में संकर प्रजनन 3) बकरी के चारे के लिए वृहत पैमाने पर मोरिंगा की खेती तथा 4) बकरी जीनोमिक्स, स्टेम सेल तथा क्लोनिंग पर नए अनुसंधान किये गए|