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    संदेश

    राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान (राडेअनुसं) एशिया में डेरी की एक प्रमुख संस्था है। इस संस्थान को “इंपीरियल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल हसबैंड्री एंड डेरिंग” के रूप में सन 1923 में बैंगलोर में शुरू किया गया था। सन 1936 में,  इसका नाम बदलकर “इंपीरियल डेरी इंस्टीट्यूट” कर दिया गया। सन् 1955 में, इसका मुख्यालय करनाल में स्थानांतरित किया गया और संस्थान का नाम बदलकर राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान कर दिया गया तथा बैंगलोर परिसर को इसके क्षेत्रीय स्टेशन के रूप में कायम रखा गया। पूर्वी क्षेत्रीय स्टेशन की स्थापना सन् 1964 में पश्चिम बंगाल के कल्याणी में की गई। ये क्षेत्रीय स्टेशन डेरी विकास के लिए क्षेत्र में विशिष्ट अनुसंधान एवं विकास संबंधी सहायता प्रदान करते हैं। संस्थान को सन 1989 में इसके मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में किये गये सर्वोत्कृष्ट कार्य को देखते हुए मानद् विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया गया।

    भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद- राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-राडेअनुसं) देश के डेरी क्षेत्र में आवश्यकता आधारित शैक्षिक कार्यक्रमों सीखने की शैली तथा शिक्षा शास्त्र में नवाचार के प्रयोग के द्वारा गुणवत्ता वाले मानव संसाधन विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।  वर्तमान समय में यहां 159 वैज्ञानिक कार्यरत हैं। राडेअनुसं डेरी प्रौद्योगिकी में बी टेक तथा डेरी विज्ञान के 16 विषयों में मास्टर डिग्री और पी एच.डी. की डिग्रियाँ प्रदान करता है तथा यहाँ विभिन्न डिग्री कार्यक्रमों के अन्तर्गत 1150 से अधिक विद्यार्थी पंजीकृत हैं। वर्तमान में संस्थान को एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है तथा देश के कृषि विश्वविद्यालयों की श्रेणी में इसने पहला दर्जा प्राप्त किया है। संस्थान बुनियादी और अनुप्रयुक्त अनुसंधान, शिक्षण और विस्तार गतिविधिओं के द्वारा डेरी विकास, पशु उत्पादकता, नए उत्पादों के विकास और प्रणालियों के द्वारा लाखों किसानों और उपभोक्ताओं के लिए लाभ का कार्य करता है। विगत 98 वर्षों के दौरान संस्थान ने डेरी उत्पादन,  प्रसंस्करण, प्रबंधन और मानव संसाधन विकास के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय विकास और विशेषज्ञता दिखाई है।

    भारत में यह उम्मीद की जा रही है कि दूध की खपत प्रति वर्ष 3-4 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी। बढ़ती हुई आबादी, बढ़ते शहरीकरण और बढ़ती क्रय शक्ति के साथ दूध और दूध उत्पादों की माँग बढ़ने की संभावना है। हमें अधिक दूध का उत्पादन करने और इसे मूल्यवर्धित उत्पादों में कुशलता से परिवर्तित करने की चुनौती के साथ करने की आवश्यकता है। पशु उत्पादन के क्षेत्र में वैश्विक प्रवृत्ति डेरी उत्पादों की खपत में तेजी और बड़े पैमाने पर वृद्धि का संकेत दे रही है। दूध की घरेलू मांग को पूरा करने और पर्याप्त निर्यात योग्य अधिशेष उत्पन्न करने के लिए हमें दूध उत्पादन में वृद्धि दर को तेज करने की आवश्यकता है। भारतीय डेरी क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत इसकी वृहत जैवविविधता और सबसे बड़ी पशुधन आबादी है। हमारी अनुसंधान प्राथमिकताएं डेरी विज्ञान के तीनों क्षेत्रों (पशु उत्‍पादन, दूध प्रसंस्‍करण तथा विस्‍तार और विपणन) में प्रौद्योगिकियों के विकास पर केंद्रित हैं। बेहतर जर्म-प्लास्म वाले जानवरों की संख्या में वृद्धि लाने की आवश्यकता है, साथ ही सीमित चारा उपलब्ध होने और चारे पर प्रतिस्पर्धा को कम करने के लिए गैर-उत्पादक और कम दूध देने वाले पशुओं की संख्या को कम किया जाना चाहिए।

    डेरी उत्पादन की कुछ प्रमुख उपलब्धियां हैं: पशुओं की दो नस्लों का विकास – करन-फ्राइज़ और करन-स्विस;  देशी पशुओं का आनुवंशिक सुधार, क्लोनिंग तकनीक का उपयोग कर दुनिया की पहली भैंस ‘गरिमा’ नामक  बछड़े का उत्पादन;  भारत की पहली ‘होली’ नामक ओवम-पिक अप-आईवीएफ साहीवाल मवेशी बछड़े का उत्पादन एवं बारहों मास चारा उत्पादन के लिए खनिज मिश्रण और प्रौद्योगिकियों का विकास। भारतीय पारंपरिक डेरी उत्पादों के डेरी प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी में भैंस के दूध के संदर्भ में रासायनिक गुण-धर्मों यथा, प्रोटीन और लिपिड का अध्ययन किया गया और सूक्ष्मजीवविज्ञानी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए किण्वित दूध उत्पादों के लिए स्थापित किया गया है। भैंस के दूध से यंत्रीकृत प्रसंस्करण उत्पादन विधि द्वारा विभिन्न उत्पादों का उत्पादन किया गया और विभिन्न प्रकार के स्वदेशी दूध उत्पादों यथा, अर्जुन हर्बल घी, कम कोलेस्ट्रॉल घी, कैल्सियम और रेशा फोर्टिफाइड डोडा बर्फी, कर्क्यूमिन फोर्टिफाइड मिल्क ड्रिंक और हर्बल उत्पादों, जैसे कि एलो-वेरा लस्सी स्वास्थ्य खाद्य पदार्थ, प्रोबायोटिक्स आदि संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान हैं।

    हाल ही में विभिन्न स्टेकहोल्डर्स की शोध-संबंधी माँगों को पूरा करने के लिए संस्थान के सामाजिक विज्ञान विषय (विभाग) ने मूल्य श्रृंखला प्रबंधन, डेरी के सतत मुद्दे, आर्थिक सुधारों, प्रभाव विकास कार्यक्रमों और डेरी प्रौद्योगिकियों, जलवायु परिवर्तन और इनके निहितार्थ के व्यापक विश्लेषण को शामिल कर अनुसंधान प्राथमिकताओं का पुनर्विन्यास किया है। विस्तार की गतिविधियों ने डेरी नवाचार प्रणाली पर अपने अनुसंधान प्रयासों को ध्यान में रखते हुए डेरी किसानों के लिए डेरी उत्पादन, प्रसंस्करण और प्रबंधन के क्षेत्र में उत्पन्न प्रौद्योगिकियों के प्रसार और डेरी अपनाने, बाधाओं और प्रभाव विश्लेषण का संचालन करने एवं जलवायु लचीलापन और लिंग सशक्तिकरण के लिए ग्रामीण समुदाय की भागीदारी बढ़ाने के लिए डेरी नवाचार प्रणाली पर अपने शोध प्रयासों को केंद्रित किया है। कृषि विज्ञान केन्‍द्र और डेरी विस्तार प्रभाग किसानों को प्रशिक्षण दे रहा है तथा पिछले एक दशक के दौरान 50000 से अधिक किसानों को डेरी पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया।

    संस्थान द्वारा पैकेज और प्रैक्टिस सहित 140 से अधिक प्रौद्योगिकियां विकसित की गईं हैं, जिनमें से 92 प्रौद्योगिकियों को व्यावसायीकरण के लिए स्टेकहोल्डर्स/उद्योगों को हस्तांतरित किया जा चुका है। संस्थान द्वारा 44 से अधिक पेटेंट दायर किए गए हैं और 26 पेटेंट संस्थान को प्रदान की गईं हैं। पिछले दशक के दौरान 3030 से अधिक शोध पत्र उच्च प्रभाव पत्रिकाओं/जर्नल में प्रकाशित हुए हैं व संस्थान द्वारा 500 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम संकाय सदस्य, वैज्ञानिक और स्टेकहोल्डर्स के लिए आयोजित किए गए हैं।

    राडेअनुसं द्वारा किए गए अनुसंधान उन्नति को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर सहयोग हेतु एक नेटवर्क के रूप में विकसित करने के लिए केंद्रित किया गया है, ताकि वैज्ञानिकों तथा अनुसंधान संगठनों के बीच उचित व सही समय में सूचना का आदान-प्रदान समय से हो। संस्थान द्वाराचिकित्सा अनुसंधान संस्थानों के साथ सहयोग क्षेत्र में चिकित्सीय अध्ययन के माध्यम से फंक्शनल फ़ूड के सत्यापन किया है। संस्थान अपने शोध के विभिन्न स्टेकहोल्डर्स जैसे कि किसानों, प्रोसेसर, नीति निर्माताओं, विस्तार एजेंसियों के साथ अपने अनुसंधान की व्यापक प्रयोज्यता को सुविधाजनक बनाने के लिए घनिष्ठ संबंध बनाए रखेगा। एनडीआरआई की डेरी क्षेत्र के भविष्य के दृष्टिकोण के साथ देश की भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक अनुसंधान और विकास सहायता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। अगले तीन दशकों में आर्थिक वातावरण और संस्थागत व्यवस्था, जिसमें भारतीय डेरी क्षेत्र कार्य करेगा, वर्तमान परिदृश्य से बहुत अलग होगा। नवीन प्रौद्योगिकियों का डेरी विकास पर बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। घरेलू उत्पादकों को दुनिया के बाजारों से जोड़ना और नई संस्थागत व्यवस्थाओं का उदय व्यापक रूप से छोटे-उत्पादक द्वारा दूध उत्पादन और असंगठित दूध प्रसंस्करण प्रणाली का स्‍थान लेगा। डेरी उत्पादन और प्रसंस्करण की संरचना में न्यू इनोवेशन सिस्टम के आधार पर विस्तार मॉडल की आवश्यकता होगी जिसके माध्यम से आईसीटी के बड़े पैमाने पर उपयोग के माध्यम से तकनीकी, संगठनात्मक, विपणन और उद्यमशीलता, मशीन सीखने और आर्टिफिसियल बुद्धिमत्ता आदि जैसे व्यापक क्षेत्रों में किसानों को विस्तार सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

    हमें उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में राडेअनुसं डेरी विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास का एक विश्व स्तरीय संस्थान साबित होगा और यह देश की अरबों की आबादी के डेरी उत्पादन, भोजन, आजीविका तथा पर्यावरण और पोषण सुरक्षा के लिए नवीन कृषि प्रौद्योगिकियों का उत्पादन करेगा।